मैथिली ग़ज़ल लेखक: अभिलाष ठाकुर

Maithili Ghazal

मैथिली ग़ज़ल (Maithili Ghazal) : गजल मूलतः अरबी शब्द छैक तँए ई बुझबामे कोनो भाँगठ नहि जे गजल नामक काव्य सर्वप्रथम अरबी भाषा सँ आएल छैक। गजल मने प्रेमिकाक आँचर सेहो होइत छैक ,गजल मने हिरणीक दर्द भरल आवाज सेहो होइत छैक, गजल मने प्रेमी-प्रेमीकाक (Maithili Prem Ghazal) गप्प सेहो होइत छैक धरि आब गजल एतय तक सिमित नहिं छैक कहबाक तात्पर्य जे जतेक विषय ततेक आ तेहन गजल। आब गजलमे भूख,गरीबी,दर्द, राजनीति,दहेज, आनो आनो बात सभ गजलकार आनि रहल छथि।

आइ एकटा ओहन युवा गजलकारकेँ अभिलाष ठाकुर (Abhilash Thakur) गजल पढ़ब जे मैथिली गजलमे मैथिली गजल (Maithili Ghazal) कम समयमे बहुत पैघ नाम बना चुकल छथि तकर कारण रचनामे कथ्य,शिल्प भाव एकदम लाजवाब रहैत छन्हिं। 

1. मैथिली ग़ज़ल

कलमक हथियार सन हथियार की हेतै।
धड़गड़ जिह्वा  सनक तलवार  की  हेतै।।

चाहे   राखू  जते  बुधियार  घर  नोकर।
पोसल  कुत्ता  सनक  रखबार  की हेतै।।

तेरहमे  जाहि  ठां  संतान  घर  जन्मय।
फेरो  सोलह  उमरि  कचनार  की  हेतै।।

जे  पठबै  छैक माँ  बाबू  क’ वृद्धाश्रम।
भेने  ओ   चौड़गर   परिवार   की  हेतै।।

जइ  रचनामे  बहर आ काफिया नै  छै।
रखने  शीर्षक  गजल  भरमार की हेतै।।

2. मैथिली गजल

अपनहुँ कने बदलियौ ने सभटा म’ सरकारक दोष।
अपने जँ  छी वृद्ध पाकल बाँकी म’ छै बालक दोष।।

चलबै  जँ  नै  थाहिकेँ  आगू  फेर डूमब अछि ठीक।
गलती अपन  मानबै नै सदिखन कहब धारक दोष।।

करबै   कर्म   थोड़बो  नै   सभ  भेटए  बैसल  ठाम।
झुठ्ठे  क’  छी  माथ  पिटने   देबै तखन भागक दोष।।

नै  भुक्त  आ  भोग्य  बूझै  छी  राशि  नै कोनो लग्न।
तैयो  अहाँ  कहि  रहल  छी अगबे कते मारक दोष।।

सुर-तालके  ज्ञान  नै  जकरा ओकरो  बड़ बड़ बात।
ताली  जँ  नै  भेटि रहलै सभटा तखन साजक दोष।।

3. मैथिली ग़ज़ल

जे  सत्य  छै  ओकरा  काटल  नै जा सकैए।
नाँगरि क’ सटका तखन भागल नै जा सकैए।।

देखा रहल की करै छी मूनल आँखि नै अछि।
पातर  नजरि  छै  बहुत बाँचल नै जा सकैए।।

भाँजू न लाठी तकर ड’र नै हमरा कनिक्को।
बच्चा  जकाँ  बूझि परतारल  नै  जा  सकैए।।

छी  चुप्प  हम  देखि तैं  बजने  जै छी अनेरो।
मजगूत  छै  यौ  कलम  तोड़ल  नै जा सकैए।।

लागल  उपरका  धुआ  जाए  कोनो  धरानी।
भीतर   बला   गंदगी  झारल  नै  जा  सकैए।।

4. मैथिली गजल: बाल गजल

पप्पा  यौ  अहाँ  सूनि  लिअ  आइ  मम्मी हमरा कना देलक।
झुठ्ठे    क’  ई  प्यार   करए  छै  गालमे  थापड़  लगा  देलक।।

कत्तेक   काल   कहू   पढ़बे   करब  कनियों  नै  खेलेबै हम।
संगी   साथी   एल   रहए  आ  घर  सँ सभ केर भगा देलक।।

कहलक  अझुका टास्क तुँ क’ले ओकर बाद देबौ हम छुट्टी।
काउन्टिंग  सभटा  सुना देलियै हम  एडिसनमे फसा देलक।।

मन  छलै  आइ  मैगी  खइतौं कहए छै काल्हिए खेने छलैं।
झट  सँ  दौड़ले  आबि  क’ हाथमे  रोटी सब्जी धरा देलक।।

अहाँ  किया  नै  कहए  छियै  किछु हमर  बात नै सूनए छै।
भोरे   उठि   के   आइयो   पप्पा  अइ  ठंढ़ामे  नहा  देलक।।

5. मैथिली गजल

साँच  जे   बाजए  अहि  ठाँ  पाड़ि  देल  जाइ  छै
फेर    झरका  क’   जंगलमे  मारि  देल  जाइ  छै।।

चुप्प   बैसल  प्रशासन  आबो   कियाक  छै  कहू
जा  क’  गोली  किया  नै  तैं  छाड़ि  देल  जाइ छै।।

बाट  जोहैत  असरा   पर  कानि  छै  रहल  कियो
आबि    रहलौअ  बेटा   कहि  टाड़ि  देल  जाइ छै

किछु समय  लेल  लोकक आवाज सुनबए तखन
मोमबत्ती    जरा    फोटो    फारि   देल   जाइ  छै।।

ओझरा    देतए    फौदारी    म’    जानि   बूझिकेँ
अंतमे  घुमि  क’  सगरो  हिय  हारि  देल  जाइ छै।।

6. मैथिली गजल

पान सनक पातर ठोर अहाँ के
आ दूध सनक मुँह गोर अहाँ के।।

हँसैत रही तऽ बड़ नीक लगै छी
देखि नै सकब हम नोर अहाँ के।।

रुकु कतेक दूर जेबइ हमरा सँ
लागल रहब हम पछोड़ अहाँ के।।

जँ साँझ मे अहाँ संग हम रही तऽ
हमरे देखि हैत भोर अहाँ के।।

कोना कऽ गढ़लैथ दैव अहाँ के
कस्सल अछि पोरे पोर अहाँ के।।

7. मैथिली गजल

पाप छै भीतर तऽ मंत्र पढ़ने की हेतए
त्रिपुंड लगा के माला जपने की हेतए।।

दूटा शब्दे जोड़ला सँ गजल नै होइ छै
तैं बिना बहर के गजल लिखने की हेतए।।

जे बुझै नइ संगीत सा रे ग म’प ध नी सा
ओहेन लोक कऽ गायक कहने की हेतए।।

जिनका पंचैती मे पंच नइ मानल गेल
हुनका सभा मध्य ठाढ़ रहने की हेतए।।

गीतकारो फरल आब अनरनेवा जेकाँ
फेसबुक पर आबि के पसरने की हेतए।।

8. मैथिली गजल

देलहा चोट आइ फेर उघार भेलै
भरल माँथ मे सिन्दूर देखार भेलै।।

हमरा तऽ मिझा गेलै इजोत जिनगी मे
एतेक दिन बाद कियो चिनहार भेलै।।

जे प्रेम के भगवान बुझै छली कहियो
आइ हुनके लेल इ सब बेकार भेलै।।

सुख बैरी भेल नै आबै हमर कोन्टा
दुखक बहैत अंगना मे टघार भेलै।।

हमरे जेना टुटल हतै करेज कतेक
तैं अइ धरा पर गजलक संचार भेलै।।

9. मैथिली गजल

तकियाक  तूर  सन  दबाएल  छी  कतेको बेर
अप्पन अछैत  हम बझाएल  छी  कतेको  बेर

बूझैत सभ अकान छी देखि ई समाजक खेल
परतारि  बाल  सन  ठकाएल छी  कतेको बेर

जीवन बहुत नचेलकै नाच  के करत प्रतिकार
पीलहुँ  कहाँ  मुदा  झखाएल  छी कतेको बेर

आयल विपति बनाक’ रस्ता सहैत रहलौं खूब
उठबैत  बोझ  थड़-थड़ाएल  छी  कतेको  बेर

ठोकड़ सिखा रहल कते डेग डेग पर अभिलाष
दुख   केर  आँचमे  पकाएल  छी  कतेको  बेर

10. मैथिली गजल

गप्प  बजलौं  सोझ  तैं  बारल  गेल छी
भोथ  छै  कोदारि  धरि  तामल गेल छी

चोर  बाजै  जोर  कतबो  किछु नै तकर
बाल  बच्चा  बूझि  परताड़ल  गेल  छी

जे  रचल तकरा  बदलि नै सकतै कियो
जीवनक   कंसारमे   लाड़ल   गेल  छी

की  कही  कोना  कही  दुख एते अपन
आन   नै   अपने  सँ तैं मारल  गेल  छी

नै  करब  हम  प्रेम  कतबो  करबै अहाँ
स्नेम  मे  पूर्वहि  सँ  हम तागल गेल छी

11. मैथिली गजल

जकरा  भरल  छै  ओ  पेट  बढ़ेने  जा  रहल
ककरो   गरीबी  जमि  केर   सतेने  जा रहल

जीबैत  सेवा  जकरा  सँ  भ नै सकलै तखन
से   खूब   मरला  पर  फूल  चढ़ेने  जा रहल

अपराध  रहए  ककरो  अहि  ठां भोगै कियो
छै    नोट   जकरा  कानून  बनेने  जा  रहल

उठलै   जखन  बिर्रो  यादक  ओकर  प्रेमकेँ
केहेन   छै   लागल   चोट   बतेने  जा  रहल

सदिखन रहल संकल्पित अपना जे लक्ष्य पर
ओ   दूभि  तरहत्थी  पर  जनमेने  जा  रहल

12. मैथिली गजल

कनिक्के  टा  बात  रहए  तार  भ  गेलै
जनमिते  बेटी  कहाँ  दनि  भार भ गेलै

झँपलकै संबंध अहि दुनियाँ  सँ कतेको
मुदा  छै  बाँचल  कहाँ  देखार  भ  गेलै

जखन  बेगरता  छलै  सटले  रहलै  ओ
कते  अनका   बेरमे   बोखार   भ   गेलै

कहू  ने  की  भेटतै  एतय  सुख  शान्ती
डकैते  सन  जाहि  ठां  सरकार  भ गेलै

शहर  हो  वा  गाम   देखैछी  अगबे  हम
कते  घँसि घँसि तिनफुट्टा भरमार भ गेलै

13. मैथिली गजल

हमर  हाथक  तोरल  गुलाब मन छउ ने
दशम  अंकक  पन्ना  किताब मन छउ ने

बिना   बारिस   कत्ते   नहैत   रहियै  से
करै  उगडुम  जे ओ  तलाब मन छउ ने

हमर जिनगी के सभसँ पैघ दिन जे छल
पहिल  चिट्ठी के कह जबाब मन छउ ने

हमर   खातिर   केलैं   तुँ   सोमवारी  से
रहौ   पहिले   कत्ते  लगाब  मन  छउ ने

जखन तों  हमरा  छोरि गेल छलही कह
भयाबह  दिन  कत्ते  खराब  मन छउ ने

14. मैथिली गजल

साल बदलल
हाल बदलल

लोक सबहक
चाल बदलल

चाम करिछन
गाल बदलल

बौह   खातिर
लाल बदलल

आँखि लगिते
माल बदलल

15. मैथिली गजल

मसुवैल काठी  छी  जरब  मोशकिल बुझाइए
खर्रैत   रहि   गेलौं  डहब  मोशकिल बुझाइए

छी  माँथ पर रखने  कते  बोझ की करब कहू
तैं  जीब  लै  छी बस मरब मोशकिल बुझाइए

कोना मनाबी मन क’ से मानि नै रहल तखन
ई  बात  प्रेमक  से  कहब  मोशकिल बुझाइए

छल  मेंहदी  मे नाम जे देखि आँखि मे गरल
से  टीस हिय के नै सहब  मोशकिल बुझाइए

एलै   जतेको   दुख   तखन संगमे  रही  अहूँ
असगर अहाँ बिनु तैं चलब मोशकिल बुझाइए

16. मैथिली गजल

समयक संग सभ किछु बदलैत रहलै
लोकक  खूब  करनी  झलकैत  रहलै

ज्ञानी  चुप्प  बैसल  छै  कात लागल
किछु बिनु बात बुझने ललकैत रहलै

जे  सभ  जीब  रहलै हम आ हमर मे
तकरो    खूब    ढ़ेका   उतरैत   रहलै

सुनलौं   जे  बँटलकै  कंबल  हजारो
से भरि  राति असगर  ठिठुरैत  रहलै

जे  अप्पन  छलै   मोजर   देलकै  नै
अनका  लेल   मिसरी  बहबैत  रहलै

17. मैथिली गजल

प्रेममे  दर्द  हमरा  देने  जा  रहल  छी
प्राण देलौं अहीं धरि लेने जा रहल छी

झूठ किरिया रहै से नै हम बूझि सकलौं
छोरिके आब ककरो भेने जा रहल छी

याद  रहबे  करत  से  जे उपहार  देलौं
स्नेहमे  खूब  धोखा  खेने जा रहल छी

की कमी छल कहू ने जे मुँह मोरि लेलौं
दूर अपना सँ हमरा केने  जा  रहल  छी

आब  बँचले कहाँ  छै जे सम्हारि राखब
यादकेँ  खूब  जिस्ता  धेने जा रहल छी